जो देखता हूँ मैं वो हकीक़त है या सपने,
तस्वीर हुई साफ़ कि दिखने लगे अपने।
मन्ज़र ही है धुंधला या है धोखा ये नज़र का,
नज़दीक मेरे कौन है और दूर हैं कितने।
भोर है या साँझ की यह सुनहरी वेला,
उम्मीद जगी है या लगी ख्वाहिशें ढलने।
नीलामी के बाज़ार में ईमान खड़ा है,
मालिक जिसे समझा था वही आया है बिकने।
कोई नहीं है अब मेरा और मैं हूँ अकेला,
मन मेरा आया है फक़ीरी को समझने।
कहता फक़ीर ज़िन्दगी है बेवफा नग़मा,
गुनगुनाता जा रहा हूँ वफ़ा से मिलने।
............................ वफ़ा से मिलने।
आदित्य विक्रम मालीवाल©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।