गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

माँ

ह्रदय ने कहा आज माँ पे कुछ लिखा जाए,
माँ को कोई उपमा नहीं दी गयी,
क्यों न आज माँ को कोई महान उपमा दी जाए ...

माँ,
तू पर्वत सी विराट है, जीना सिखाने वाला ममतामयी पाठ है...
पर्वत की महानता तो तुझमें आ जाती है,
लेकिन उसकी कठोरता कहीं खो जाती है,
और यहीं आकर माँ पर्वत की उपमा तुझसे छोटी हो जाती है।

माँ,
तू सागर सी गहरी है, दुलार और स्नेह जैसे रत्नों की प्रहरी है...
सागर की गहराई तो तुझमें समां जाती है,
लेकिन उसकी विनाशलीला कहीं खो जाती है,
और यहीं आकर माँ सागर की उपमा तुझसे छोटी हो जाती है।

माँ,
तू गगन सी असीमित है, तू है तो हम जीवित हैं...
गगन का निर्मल प्रकाश तो तुझमें आ जाता है,
लेकिन काली रात का अन्धेरा कहीं खो जाता है,
और यहीं आकर माँ गगन भी तुझसे छोटा हो जाता है।

सत्य है...
माँ को कोई उपमा नहीं दी जा सकती
क्योंकि माँ से बड़ी कोई उपमा नहीं होती ..
माँ तो माँ होती है, कोई "उप-माँ" नहीं होती...।।ॐ।।


आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

"चार दिवारी छत और मैं ।"

इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।

रात साँवली एक सहेली, 
गोरा-चिट्टा दिन है दोस्त,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।

जहाँ चले तन्हाँ परछाई,
मैं भी उसके पीछे चलूँ,
नीले अम्बर के कागज़ पर,
पंछी होकर चित्र बनूँ,
इन्द्र धनुष की तिरछी डाली,
पर है नीली-नीली ओस,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।

मेरी है हर साँझ सुनहरी,
खिला-खिला हर एक सवेरा,
हर पल में मुस्कान बिखरती,
रातों का छट गया अन्धेरा,
एक अकेला मैं अलबेला,
और निराली मेरी सोच,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।

साथ हज़ारों का है फिर भी,
अलग वो चेहरा दिखता है,
मस्त फक़ीरी क़ीमत मेरी,
आज फक़ीरा बिकता है,
मालिक मेरा ऊपर वाला,
वही खरीदे मन का बोझ,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।

रात साँवली एक सहेली, 
गोरा-चिट्टा दिन है दोस्त,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।

आदित्य विक्रम मालीवाल©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।

(संयुक्त रचना, संशोधित संस्करण)

रविवार, 17 अप्रैल 2016

"अरमाँ-ऐ-दिल ।"

दिल हमारा हसरतों की,
चाह में मदहोश़ था,
मालिक-ए-हसरत की,
महफिल का ये कैसा नूर है |

इक दिया अरमानों का,
हमनें भी रौशन कर लिया,
बुझा कर जो हँस दिये वो,
जहाँ में मशहूर हैं |

इश्क़ है उनसे,
ये कहता दिल मेरा रुकता नहीं,
पास होकर भी,
ये परवाना शमा से दूर है |

आज कह दूँ हाले दिल,
मौका भी है दस्तूर भी,
सामने बैठी कयामत,
सी वो कोई हूर है |

दिल जलाकर इश्क़ करना,
है अदा उनकी मगर,
खाक़-ए-दिल में फिर भी,
धड़कन को वही मंज़ूर है |

आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |