रविवार, 17 अप्रैल 2016

"अरमाँ-ऐ-दिल ।"

दिल हमारा हसरतों की,
चाह में मदहोश़ था,
मालिक-ए-हसरत की,
महफिल का ये कैसा नूर है |

इक दिया अरमानों का,
हमनें भी रौशन कर लिया,
बुझा कर जो हँस दिये वो,
जहाँ में मशहूर हैं |

इश्क़ है उनसे,
ये कहता दिल मेरा रुकता नहीं,
पास होकर भी,
ये परवाना शमा से दूर है |

आज कह दूँ हाले दिल,
मौका भी है दस्तूर भी,
सामने बैठी कयामत,
सी वो कोई हूर है |

दिल जलाकर इश्क़ करना,
है अदा उनकी मगर,
खाक़-ए-दिल में फिर भी,
धड़कन को वही मंज़ूर है |

आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

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