"दिल से आवाज़ है जब उठती, ये कवि कविता लिखता है, दीवानो की इस महफ़िल में, वो एक तो उसकी सुनता है, पढ़कर मेरी कविताओं को, कोई मुझको भी समझेगा, उम्मीद का दामन थाम कवि, आग़ाज़ यहीं से करता है" . . . . आदित्य विक्रम मालीवाल© चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
साँझ बन जो ढल चुका है, सूर्य वह कल फिर उगेगा । जो पिघल कर बह गया है, बर्फ बन वह फिर जमेगा । धैर्य ज्योति को जला विश्वास तुम इतना रखो, अपने भारत देश का, मस्तक सदा ऊँचा रहेगा.. ॥ॐ॥
आदित्य विक्रम मालीवाल © चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
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