साँझ बन जो ढल चुका है, सूर्य वह कल फिर उगेगा ।
जो पिघल कर बह गया है, बर्फ बन वह फिर जमेगा ।
धैर्य ज्योति को जला विश्वास तुम इतना रखो,
अपने भारत देश का, मस्तक सदा ऊँचा रहेगा.. ॥ॐ॥
आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
साँझ बन जो ढल चुका है, सूर्य वह कल फिर उगेगा ।
जो पिघल कर बह गया है, बर्फ बन वह फिर जमेगा ।
धैर्य ज्योति को जला विश्वास तुम इतना रखो,
अपने भारत देश का, मस्तक सदा ऊँचा रहेगा.. ॥ॐ॥
आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
अपनी खोई पहचान को, गर्व से अपनाना है,
अब “इण्डिया" को “भारत" बनाना है..॥
श्रीमति के श्रीमान् से
मिसेज़ के मिस्टर हो गये,
भारतीय बहिन-भाई से
इण्डियन ब्रदर-सिस्टर हो गये,
माँ बनी मोम और
ज़िन्दा बाप डेड हो गये,
भारतीयों की पहचान काले बाल,
बरगेंडी या रेड हो गये,
रंग बदल लो चाहे नाम
रक्त वही रह जाना है,
अब “इण्डिया" को “भारत" बनाना है..॥
इण्डियन “कल्चर" की अजब ख्याती है
इन्हीं के बनाये ब्रदर हुए ब्रो और
सिस्टर सिस हो जाती है,
मिसेज़ अचानक मिस हो जाती है,
और मिस्टर के तो क्या कहने
स्त्री हो चाहे धन
हमेशा पराये पे ही नजर जाती है,
बच्चों और बड़ों का लिहाज रहा नहीं
“यूथ" को नंगा होने में भी शर्म नहीं आती है,
इन्हीं युवाओं को पुनः वस्त्र पहनाना है,
अब “इण्डिया" को “भारत" बनाना है..॥
मूल समस्या ये है मित्रों
हम समझना नहीं हैं चाहते,
आन्दोलन और बदलाव की बात करने वाले
अक्सर कान बन्द करके हैं चिल्लाते,
अस्तित्व तक का पता नहीं
मित्रों कौन सी व्यवस्था बनाओगे,
वर्षों की पहचान को खोकर
क्या बदलाव ला पाओगे,
"भारत" नाम से जुड़ा बहुत कुछ
कला, संस्कृति और विज्ञान,
500 साल से नहीं हमारी
युगों-युगों से है पहचान,
इसी पहचान का सत्य समझकर
हर भारतीय को समझाना है,
अब “इण्डिया" को “भारत" बनाना है..॥
अपनी खोई पहचान को, गर्व से अपनाना है,
अब “इण्डिया" को “भारत" बनाना है..॥
आदित्य विक्रम मालीवाल©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
अरमां-ऐ-दिल मासूम हक़ीकत,
फिर कोई कैसे दूर गया ।
वफ़ा को मैं कैसे समझाऊँ,
घर ईमाँ का टूट गया ।
है सच्चाई या है साज़िश
दिल मेरा पूछे हर बार ।
मस्त फक़ीरी और यह रिश्ते,
दोनों में है बड़ी दऱार ।
काँच गिराएँ हम ऊपर से,
फिर भी दोष जमीं का है ।
जो तोड़ रहे हैं सपनें अक़्सर,
हमको होश उन्हीं का है ।
खुली आँख से जियो हक़ीकत,
भोर भई अब रैन कहाँ ।
सपनों का अन्जाम पता है,
पर हसरत को चैन कहाँ ।
सुन दीवाने, कहे फक़ीरा,
सच क्या है पहचानों तुम ।
छोड़ के दिल की हर कमज़ोरी,
इन्सान के अन्दर झाँको तुम ।
आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।