अरमां-ऐ-दिल मासूम हक़ीकत,
फिर कोई कैसे दूर गया ।
वफ़ा को मैं कैसे समझाऊँ,
घर ईमाँ का टूट गया ।
है सच्चाई या है साज़िश
दिल मेरा पूछे हर बार ।
मस्त फक़ीरी और यह रिश्ते,
दोनों में है बड़ी दऱार ।
काँच गिराएँ हम ऊपर से,
फिर भी दोष जमीं का है ।
जो तोड़ रहे हैं सपनें अक़्सर,
हमको होश उन्हीं का है ।
खुली आँख से जियो हक़ीकत,
भोर भई अब रैन कहाँ ।
सपनों का अन्जाम पता है,
पर हसरत को चैन कहाँ ।
सुन दीवाने, कहे फक़ीरा,
सच क्या है पहचानों तुम ।
छोड़ के दिल की हर कमज़ोरी,
इन्सान के अन्दर झाँको तुम ।
आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
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