सब करने को बर्बाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!
कई रात नहीं जो सोये,
अभिमान बना आभूषण
ये सत्ता मद में खोये,
बन्द कानों से सुनना चाहें
पाञ्चजन्य का नाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!
कई हैं ठेकेदार,
हर नुक्कड़ पर खड़े प्रवक्ता
करने बातें चार,
अध जल गगरी छलकत जाए
बढ़ते रहे विवाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!
व्यर्थ भँवर में फँसी है नैया,
याद करो पुरखों की ख्याति
कर विकास तुम बनों खिवैय्या,
जो ना सुधरे तो जड़ें ख़त्म
बस रह जायेगी खाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!
सब करने को बर्बाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |