गुरुवार, 28 मई 2015

"यह हैं आज के माॅडर्न युवा..!!"

हर माँ बच्चे से पूछ रही
पापा दोहराए बात वही
पैदा तो ये इन्सान हुए थे
अब इनको क्या हुआ ?
यह हैं “आज" के “मॉडर्न" युवा..!!

जूते, कपड़े, गाड़ी, मोबाइल
पहचान है इनकी “यो यो" स्टाइल
बाल रंगा के कान छिदा के
गोग्ज़ पहनके देना स्माइल
धुत्त नशे में खूब थिरकना
और उड़ाना धुआँ
यह हैं “आज" के “मॉडर्न" युवा..!!

रोज इन्हें कुछ नया है करना
नये के नाम पे पागल बनना
चमक दमक से खूब ठगाना
और लोगों की ज़ेबें भरना
बदल के मटका हुआ कसीनो
खेल वही है जूआ
यह हैं “आज" के “मॉडर्न" युवा..!!

झूठ बोलकर खुश ये होते
बिन पैंदे के हैं ये लोठे
धरम ईमान की लगा के लंका
धोखा देकर चैन से सोते
बस खुदको ही शेर समझते
बाकी सबको चूहा
यह हैं “आज" के “मॉडर्न" युवा..!!

धेले भर की नहीं तमीज़
शान से पहने फटी कमीज़
शर्म हया की बात ही छोड़ो
“बत्तमीज़ दिल" इन्हें अजीज़
सब डूब रहे हैं फेशन में
बरबादी का है कुँआ
यह हैं “आज" के “मॉडर्न" युवा..!!

आदित्य विक्रम मालीवाल©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

शनिवार, 23 मई 2015

"भारत भव्य बनाना है..॥ॐ॥"


मातृभूमी की सेवा में, जीवन अर्पण कर जाना है..
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|

भगत सिंह, आज़ाद या बिस्मिल, हुए सिंह बलिदान यहाँ
सन्त विवेकानन्द के जैसे, सारे जग में और कहाँ
लाखों ने की माँ की सेवा, आगे हमें निभाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|

भ्रष्ट हुआ चारित्र्य हमारा, पतन हुआ नैतिकता का
भूल चुके थे निज गौरव को, लोभ बचा बस सत्ता का
कपट, स्वार्थ और लोभ त्याग कर, सद्चारित्र्य जगाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|

पुण्य धरा है भारत भूमी, जीवन का आधार यही
भ्रष्ट आचरण और प्रदूषण, वर्षों से यह झेल रही
स्वच्छ रहूँगा, रहने दूँगा, करके यही दिखाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|

आज चला है देश पुनः, गरिमा पथ पर सिर ऊँचा कर
कर्म करेंगे प्रण लेते हैं, होंगे सभी आत्मनिर्भर
विश्वगुरू कहलाते थे, सम्मान वही फिर पाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|

मातृभूमी की सेवा में, जीवन अर्पण कर जाना है..
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|


आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

"एक तूफाँ दिल में है, बेरूखी महफ़िल में है"

एक तूफाँ दिल में है
बेरुखी मेहफ़िल में है..!

इक ज़माना वो भी था
थे हमीं आँखों के तारे,
ज़ुबाँ पे भी बस हमीं थे
हम थे सबके, सब हमारे,
खुशियों का दरिया उफनता
रंजो-ग़म साहिल पे है,
एक तूफाँ दिल में है
बेरुखी मेहफ़िल में है..!

बदली करवट कब समाँ ने
क्या हुआ यह कौन जाने,
था भरोसा खुदा पे
करने लगा वो भी बहाने,
हाल-ए-किस्मत की है सज़िश
अपने भी शामिल से हैं,
एक तूफाँ दिल में है
बेरुखी मेहफ़िल में है..!

बीते लम्हों का तसव्वुऱ
आज भी लफ्ज़े ज़ुबाँ है,
जो हमें करती बयाँ
वो दासताँ हमसे खफ़ा है,
साफ दिल की आज पहचाँ
सूरत-ए-कातिल से है,
एक तूफाँ दिल में है
बेरुखी मेहफ़िल में है..!

आदित्य विक्रम मालीवाल©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

गुरुवार, 21 मई 2015

एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!

अन्त इबारत मेरी है
सूरज ढलने का नाम हूँ मैं
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!

दिन हुआ ख़त्म मैं आती हूँ
और सबको घर ले जाती हूँ,
जो भटक गये थे एक सुबह
मैं उनको राह दिखाती हूँ,
दौड़ रहे सब जीने को बस
कुछ पल का आराम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!

भूल के सच जीवन का हम
दिन में पूरे अरमान करें,
मेरे आते ही हर इन्साँ
ऊपर वाले को याद करे,
बेदर्द मतलबी दुनियाँ को
उस मालिक का पैगाम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!

सुबहा करती है रोज़ अलग
हर शाम उन्हें मिलवाती है,
कोई कर रहा है इन्तज़ार
एहसास तुम्हें करवाती है,
पहचान मेरी कुछ काली है
बस इसिलिये बदनाम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!

जो बयाँ करूँ तो हूँ मैं क्या...
छोटा एक नज़ारा हूँ,
जो परम सत्य है जीवन का
मुक्ति का एक इशारा हूँ,
आज़ादी तुम कह सकते हो
आगाज़ नहीं अन्जाम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!

अन्त इबारत मेरी है
सूरज ढलने का नाम हूँ मैं
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
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आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़राजस्थान