मातृभूमी की सेवा में, जीवन अर्पण कर जाना है..
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
भगत सिंह, आज़ाद या बिस्मिल, हुए सिंह बलिदान यहाँ
सन्त विवेकानन्द के जैसे, सारे जग में और कहाँ
लाखों ने की माँ की सेवा, आगे हमें निभाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
सन्त विवेकानन्द के जैसे, सारे जग में और कहाँ
लाखों ने की माँ की सेवा, आगे हमें निभाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
भ्रष्ट हुआ चारित्र्य हमारा, पतन हुआ नैतिकता का
भूल चुके थे निज गौरव को, लोभ बचा बस सत्ता का
कपट, स्वार्थ और लोभ त्याग कर, सद्चारित्र्य जगाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
भूल चुके थे निज गौरव को, लोभ बचा बस सत्ता का
कपट, स्वार्थ और लोभ त्याग कर, सद्चारित्र्य जगाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
पुण्य धरा है भारत भूमी, जीवन का आधार यही
भ्रष्ट आचरण और प्रदूषण, वर्षों से यह झेल रही
स्वच्छ रहूँगा, रहने दूँगा, करके यही दिखाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
भ्रष्ट आचरण और प्रदूषण, वर्षों से यह झेल रही
स्वच्छ रहूँगा, रहने दूँगा, करके यही दिखाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
आज चला है देश पुनः, गरिमा पथ पर सिर ऊँचा कर
कर्म करेंगे प्रण लेते हैं, होंगे सभी आत्मनिर्भर
विश्वगुरू कहलाते थे, सम्मान वही फिर पाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
कर्म करेंगे प्रण लेते हैं, होंगे सभी आत्मनिर्भर
विश्वगुरू कहलाते थे, सम्मान वही फिर पाना है
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
मातृभूमी की सेवा में, जीवन अर्पण कर जाना है..
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
राष्ट्रभाव को आत्मसात कर, भारत भव्य बनाना है|
आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |
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