अन्त इबारत मेरी है
सूरज ढलने का नाम हूँ मैं
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
दिन हुआ ख़त्म मैं आती हूँ
और सबको घर ले जाती हूँ,
जो भटक गये थे एक सुबह
मैं उनको राह दिखाती हूँ,
दौड़ रहे सब जीने को बस
कुछ पल का आराम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
भूल के सच जीवन का हम
दिन में पूरे अरमान करें,
मेरे आते ही हर इन्साँ
ऊपर वाले को याद करे,
बेदर्द मतलबी दुनियाँ को
उस मालिक का पैगाम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
सुबहा करती है रोज़ अलग
हर शाम उन्हें मिलवाती है,
कोई कर रहा है इन्तज़ार
एहसास तुम्हें करवाती है,
पहचान मेरी कुछ काली है
बस इसिलिये बदनाम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
जो बयाँ करूँ तो हूँ मैं क्या...
छोटा एक नज़ारा हूँ,
जो परम सत्य है जीवन का
मुक्ति का एक इशारा हूँ,
आज़ादी तुम कह सकते हो
आगाज़ नहीं अन्जाम हूँ मैं,
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
अन्त इबारत मेरी है
अन्त इबारत मेरी है
सूरज ढलने का नाम हूँ मैं
एक सुनहरी शाम हूँ मैं ..!!
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आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
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