शनिवार, 23 जुलाई 2016

"ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से ।"

बेईमानों की महफ़िल में, 
कोई तो होगा नेक ।
ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से, 
मिल जाएगा एक...॥

किसको बोलें और क्या बोलें,
इस दुनियाँ में सब ज्ञानी हैं,
नेताओं को क्या गाली दें,
हम सबकी यही कहानी है,
सच्चाई को आग लगा बस,
बस अपनी रोटी सेक,
ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से, 
मिल जाएगा एक...॥

मुल्क़ की रखते शान नहीं,
बच्चों, बूढ़ों का मान नहीं,
माँ, बेहनों का सम्मान नहीं,
"कचरा" हैं हम "इन्सान" नहीं ।
जो बनना है इन्सान तो मन का,
पाप तू बाहर फेंक ।
ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से, 
मिल जाएगा एक...॥

मैंनें ज्यों ही बन्द की आँखें, 
कानों में गूँजी आवाज़ ।
कहे फक़ीरा झाँक ले अन्दर,
समझले अपने दिल का राज़ ।
छोड़ के दुनियाँ, पकड़ आईना, 
पहले खुद को देख ।
ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से, 
मिल जाएगा एक...॥

कहे फक़ीरा अन्त समय,
बन्द आँखों से ही जाना है ।
खुली आँख जो जमा किया,
वह सब-कुछ यहीं चुकाना है ।
ऊपर वाले का काम करो,
बस वही रखेगा टेक ।
ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से, 
मिल जाएगा एक...॥

बेईमानों की महफ़िल में, 
कोई तो होगा नेक ।
ढूँढ फक़ीरा बन्द आँखों से, 
मिल जाएगा एक...॥

आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।

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