बुधवार, 27 जुलाई 2016

" कैसे हों आबाद !!"

चले गुरु और चेला जी
सब करने को बर्बाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!

तप खाया है उनका
कई रात नहीं जो सोये,
अभिमान बना आभूषण
ये सत्ता मद में खोये,
बन्द कानों से सुनना चाहें
पाञ्चजन्य का नाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!

राष्ट्रभक्ति मज़दूरी हो गयी
कई हैं ठेकेदार,
हर नुक्कड़ पर खड़े प्रवक्ता
करने बातें चार,
अध जल गगरी छलकत जाए
बढ़ते रहे विवाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!

अब भी समय है जागो भैया
व्यर्थ भँवर में फँसी है नैया,
याद करो पुरखों की ख्याति
कर विकास तुम बनों खिवैय्या,
जो ना सुधरे तो जड़ें ख़त्म
बस रह जायेगी खाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!

चले गुरु और चेला जी
सब करने को बर्बाद,
जो अपनी जड़ ख़ुद खोदे
वह कैसे हों आबाद !!


आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें