इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।
रात साँवली एक सहेली,
गोरा-चिट्टा दिन है दोस्त,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।
जहाँ चले तन्हाँ परछाई,
मैं भी उसके पीछे चलूँ,
नीले अम्बर के कागज़ पर,
पंछी होकर चित्र बनूँ,
इन्द्र धनुष की तिरछी डाली,
पर है नीली-नीली ओस,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।
मेरी है हर साँझ सुनहरी,
खिला-खिला हर एक सवेरा,
हर पल में मुस्कान बिखरती,
रातों का छट गया अन्धेरा,
एक अकेला मैं अलबेला,
और निराली मेरी सोच,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।
साथ हज़ारों का है फिर भी,
अलग वो चेहरा दिखता है,
मस्त फक़ीरी क़ीमत मेरी,
आज फक़ीरा बिकता है,
मालिक मेरा ऊपर वाला,
वही खरीदे मन का बोझ,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।
रात साँवली एक सहेली,
गोरा-चिट्टा दिन है दोस्त,
इस घर में हैं बस छः ही लोग,
चार दिवारी छत और मैं ।
आदित्य विक्रम मालीवाल©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
(संयुक्त रचना, संशोधित संस्करण)
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