गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

माँ

ह्रदय ने कहा आज माँ पे कुछ लिखा जाए,
माँ को कोई उपमा नहीं दी गयी,
क्यों न आज माँ को कोई महान उपमा दी जाए ...

माँ,
तू पर्वत सी विराट है, जीना सिखाने वाला ममतामयी पाठ है...
पर्वत की महानता तो तुझमें आ जाती है,
लेकिन उसकी कठोरता कहीं खो जाती है,
और यहीं आकर माँ पर्वत की उपमा तुझसे छोटी हो जाती है।

माँ,
तू सागर सी गहरी है, दुलार और स्नेह जैसे रत्नों की प्रहरी है...
सागर की गहराई तो तुझमें समां जाती है,
लेकिन उसकी विनाशलीला कहीं खो जाती है,
और यहीं आकर माँ सागर की उपमा तुझसे छोटी हो जाती है।

माँ,
तू गगन सी असीमित है, तू है तो हम जीवित हैं...
गगन का निर्मल प्रकाश तो तुझमें आ जाता है,
लेकिन काली रात का अन्धेरा कहीं खो जाता है,
और यहीं आकर माँ गगन भी तुझसे छोटा हो जाता है।

सत्य है...
माँ को कोई उपमा नहीं दी जा सकती
क्योंकि माँ से बड़ी कोई उपमा नहीं होती ..
माँ तो माँ होती है, कोई "उप-माँ" नहीं होती...।।ॐ।।


आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

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