शुक्रवार, 12 जून 2015

"बाल मज़दूरी... एक अपराध, एक श्राप"

"ए सुन, शुश-शुश, ओये छोटू,
ज़रा ये लाना, ज़रा वो लाना,
क्या यह हमारी इन्सानियत है?
बच्चों से मज़दूरी करवाना ??

न नौकरी देने वाला शर्माए,
न काम लेने वाला शर्माए,
और कोई मासूम बचपन,
गरीबी और लाचारी के दलदल में फसता जाए !!!

क्यों न हम सब मिलकर आगे आयें,
अपनी झूठी इन्सानियत को सच्चा बनायें,
किसी मासूम का हाथ पकड़,
कुछ ऐसा करें की उसकी ज़िन्दगी बन जाए ।

सिर्फ बच्चों से काम न लेना,
नहीं है सम्पूर्ण उपाय,
हो सके तो उनमें,
पढ़ने लिखने की अलख जगाएँ ।

बालश्रम और बच्चों पर अन्याय को तो,
जड़ मूल से मिटाना ही है,
साथ में बच्चों को ,
रोटी, कपड़ा और छत देकर पढ़ाना भी है ।

आओ मिलकर प्रण करें,
कम से कम एक मासूम को तो बचायेंगे,
बाल मज़दूरी को रोक इन्हें पढ़ाएंगे-लिखाएँगे,
और देश का भविष्य बनायेंगे...।।"


बाल मज़दूरी का विरोध करें, उन प्रतिष्ठानों का विरोध करें जो बच्चों के जायज़ अधिकारों का हनन कर उनसे मज़दूरी करवाते हैं और ऐसे लोगों को बहिष्कृत करें जो स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए बालश्रम को बढ़वा देते हैं। साथ ही साथ अगर आपकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति इस योग्य है कि किसी बच्चे को आप सहायता कर सकते हैं तो अवश्य करें। ईश्वर का कार्य है किसी बच्चे का जीवन बनाना । चाहे कोई और पुण्य ना करें परन्तु इन बच्चों का जीवन बनाने का यथा सम्भव प्रयास करें ।

आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।

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