"दिल से आवाज़ है जब उठती, ये कवि कविता लिखता है, दीवानो की इस महफ़िल में, वो एक तो उसकी सुनता है, पढ़कर मेरी कविताओं को, कोई मुझको भी समझेगा, उम्मीद का दामन थाम कवि, आग़ाज़ यहीं से करता है" . . . . आदित्य विक्रम मालीवाल© चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
चली गोलियाँ कभी इधर से, चली गोलियाँ कभी उधर से, कभी सिपाही, कभी नक़्सली, बस मरते अपने लोग । गोरों के पापी कर्मों ने, और कुछ गद्दार निकम्मों ने, बाँट दिया मेरे भारत को, दिया है ऐसा रोग ।
आदित्य विक्रम मालीवाल © चित्तौड़गढ़, राजस्थान ।
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