सोमवार, 21 दिसंबर 2015

ज़ुल्म की है इन्तेहाँ !!

ज़ुल्म की है इन्तहाँ
सो रहा है ये जहाँ
पूछता है आज शायर
ऐ ख़ुदा तू है कहाँ..!!

बेटियों को कोख में ही
मारने की सोचते हैं
और जो ज़िन्दा बची हैं
रोज उनको नोचते हैं
इन्साँ नहीं हम जानवर हैं
शर्मों हया अब है कहाँ..!!
ज़ुल्म की है इन्तहाँ
सो रहा है ये जहाँ |

देवियाँ कहते इन्हीं को
दुर्गा कहकर पूजते हैं
और जब मौका लगे
इज्ज़त इन्हीं की लूटते हैं
हैवानों का है बोलबाला
इन्साँनियत अब है कहाँ..!!
ज़ुल्म की है इन्तहाँ
सो रहा है ये जहाँ |

अस्मत किसी की रोज लुटती
क्यों नहीं आवाज़ उठती
खून क्यों सबका न खौला
मर्द असली क्यों न बोला
रूह रो रो कर पुकारे
कोई समेटो सिसकियाँ..!!
ज़ुल्म की है इन्तहाँ
सो रहा है ये जहाँ |

पूछता है आज शायर
ऐ ख़ुदा तू है कहाँ..!!


आदित्य विक्रम मालीवाल ©
चित्तौड़गढ़, राजस्थान |

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